Tuesday, 31 March 2015

मुनिया का आकाश

"मुनिया का आकाश"

गर्मी की चंदनियां रात में,
मुनिया छत पर लेटी थी,
छज्जे पर कदम की छईयां
हवा के हल्के झोंके से,
कुछ इधर कुछ उधर हिलडुल झूल रही थीI

मुनिया ने सोचा-
इस रंग- बिरंगी दुनिया में   
बेटी क्यों अनचाही है?                
बेटा तो फूल खिला, बेटी एक कली मुरझाई है!  
बाबा जो मुझको कहते हैं,चुपचाप उसे सह लेती हूँ,   
जानती हूँ, वह पुरुष हैं, उनकी प्रकृति वही है,

लेकिन?
अम्मा की उपेक्षा,हर दिन मुझको डसती है,
सोचती हूँ – वह भी तो एक औरत है, 
फिर साथ मेरे ऐसा वो क्यों करती है? 
बेचारी! अम्मा भी क्या कर सकती है,    
औरत है, औरत के सब भोगों को सहती है I 
लड़की जनम नरक है, तू क्यों इसमें आ गई?  
मुझसे कह यह, रोती है I

मुनिया ने ऊपर को देखा –
अपना आकाश तो खली है !
आसमान पर चाँद-सितारे, बिखरे इतने सारे हैं,
फिर क्यों, मेरा आकाश ही खाली है?  
 
नहीं-नहीं अब और नहीं -     
मैं भी इक दिन तारा बन चमकूंगी,
उसके (आकाश) खालीपन को, 
अपने जगमग से भर दूँगी I

तब –    
निंदिया ने धीरे से उसको थपकी दे सुला दिया,  
उसकी दर्द भरी आँखों को,

पलकों के नीचे छुपा लिया I