Thursday, 30 July 2015

प्रगति चिन्ह !

मुझे दो वह चिन्ह,
जो बने मेरा मार्गदर्शक –
ऊँचाई हिमालय की, गहराई समुद्र की,
चमकती सफेदी हिमखण्ड सी,
अडिग, अमर, अखण्डित,
सूर्य सारथी अरुण,
ओजस्वी, तेजस्वी, तम नाशक,
ईश्वर वाहक !
महानता अशोक चक्र की,
प्रगतिशीलता काल चक्र की,
अजन्ता सी समलंकृत आकृति,
उत्साह प्रवाहित प्रकृति,
पाखण्ड, आडम्बर हो खण्ड-खण्ड,
पग बाधा का हो शत्रु निरन्तर,
चट्टानी कठोरता, हो वारि तरलता,
पथगामी हो सत्य अनुगामी,
प्रभावहीन जिस पर ऋतु अन्तर,
प्रतिदिन प्रयत्न, दृढ़ निश्चय,
सिद्धान्त सरल –
लक्ष्य भेदना, लक्ष हो विस्मय !
धैर्य, साहस, पराक्रम हो प्रताप की,
गति वेग चेतक सी,
मुझे दो वह –
प्रगति चिन्ह !

Thursday, 23 July 2015

गुमगश्ता (खोया हुआ, भटकता हुआ)

 ये अर्जमन्द मुल्क जितना मेरा है, उतना ही तेरा है ,
 फिर क्यूँ हममें बाकी ‘कीना’ है ?

गुमगश्ता है आजकल खुद ही से,
पूछता है पता किसी और का ?

हर शख्स अदम और आशुफ़्ता है,
इस आज़ाद हिन्दुस्तान में .........

रूह घुट रही है क़फ़स में तेरे,
ऐ खुदा, कि अब हमें अत्फ़ बख्श !

यहाँ अव्यवस्था की व्यवस्था है,
मगर सब दुरुस्त है !



(अर्जमन्द =महान /, कीना = द्वेष, वैर)

(गुमगश्ता = खोया हुआ, भटकता हुआ)

अदम = अस्तित्व हीन, शून्य)

(आशुफ़्ता = घबराया हुआ, बौखलाया हुआ, भ्रमित)

( क़फ़स = शरीर, पिंजरा )

(अत्फ़ = दया, कृपा, प्रेम)

Monday, 6 July 2015

अश्क़ होते बाकी तो.....

1.    दिल जलता है तो जल जाने दे,
            कि बाहर अँधेरा ही अँधेरा है I

2.    यूँ तो चिराग घर-घर में रोशन होते हैं,
पर किसी-किसी के ही दिल के दिए जलते हैं I

3.    नज़रें ढूँढ लेतीं हैं अँधेरों में भी रोशनी,
नज़र भर के देख तो सही !

4.    हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं ऐ जहाँ,
वक़्त खुद ही सुनाएगा हमारी दास्ताँ I

5.    हिम्मत –ए – चिराग  गर रहे रोशन अँधेरों में,
रास्ते खुद ब खुद रूबरू होंगे कारवाँ में  I

6.     राही थका-थका है, मंज़िल भी अभी दूर.....
मुश्किल ही सही, मगर जाना है जरूर I

7.    अश्क़ होते बाकी तो कुछ कतरे बहा लेता अपनी मईय्यत पे,
जो बह गए थे कभी तेरी बेवफ़ाई के साथ I  

8.    दुनिया ने मुझको लूटा अपना कह-कह के,
           दिल मेरा है टूटा अपनों का सह-सह के I

9.    वैसे तो इस दिल पे हर किसी ने चोट की,
           ये तो मेरा दिल है कि हर चोट सह गया I

10. दूर –दूर तक है गीला आसमाँ, जहाँ नज़र जाए ठहर,

            बस वहीं बरस –बरस….

Thursday, 2 July 2015

‘एक सुबह’

बुनते उम्र के धागे से गुंथा – बंधा,
माँ के आँचल से बाहर सर्द में एक सुबह,
जब उस छोटे लेकिन अपने से आँचल में था,
तब पूरी दुनिया वहीँ जैसे सिमट गई I
अब भी ‘मैं’ ही हूँ, फिर क्यूँ वही,
आँखों से निकलकर दूर..........तक फैल गई ?
लौट नहीं सकता, जो वह मेरा था,
बस सपना बनकर खुलना है,

हर दिन, हर एक सुबह !