बुनते
उम्र के धागे से गुंथा – बंधा,
माँ के
आँचल से बाहर सर्द में एक सुबह,
जब उस छोटे
लेकिन अपने से आँचल में था,
तब पूरी
दुनिया वहीँ जैसे सिमट गई I
अब भी ‘मैं’
ही हूँ, फिर क्यूँ वही,
आँखों से
निकलकर दूर..........तक फैल गई ?
लौट नहीं
सकता, जो वह मेरा था,
बस सपना
बनकर खुलना है,
हर दिन,
हर एक सुबह !
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