Thursday, 3 March 2016

अब तय करना है...

ये दौर है जुबानों का,
बगैर कोई –
टकराव, पत्थराव, आगजनी या कर्फ्यू,
पर होंगे सब –
आहत, घायल,
बढ़ेंगी –
दूरियाँ, कड़वाहटें और खामोश शोरोगुल ......
अब तय करना है कि हम –

मर के जियेंगे या जी के मरेंगे !


तोल दो मुझे कि मुझमें मैं कितना बाकी हूँ.........


  1. मैं इतना भर गया कि... मैं खाली हो गया....                                       =====================================
  2. अब हमें ना उठाओ कि सूरते हालात से अच्छा है मर जाना !                         =====================================
  3. ये शहर है एक मीठा जहर,
    जिसका असर होता है-
    धीरे-धीरे .........                                                                                      ================================
  4. हम घर से निकले, ख्याल आया..... खुद को भूल के निकले !                                 =======================================
  5. मत करो शोर इस तरह कि,
    मशीन भी हो जाये हमारी तरह ...... बेदिल, बेअदब, बेहया !                             ==============================
  6. तोल दो मुझे कि मुझमें मैं कितना बाकी हूँ.........                                                      =================================
  7. तू आसमां का, वो इस जमीं के,हमें तलाश है इक अदद उफ़्क की........., (उफ़्क = क्षितिज)                   ===========================================================
  8. वो शैतान को मारेंगे, ये राक्षस को,
    और फिर इन्सान मारा जायेगा ..........                                                     ===============================
  9. मेरे ही किरदारों से इक रोज... कत्ल कर दिया जाउँगा मैं, ना मैं खुदा रहा ना कातिब !, (कातिब = लेखक) ====================================================================
  10. हमें फ़क़त मरना आया, अभी हम इस दुनिया के नहीं !                                 ===================================
  11. कुछ यूँ किनारे पे पड़ी थी औंधे मुँह ज़िन्दगी, बेजान खुदा ! तू गिरया था कहीं.                               ==================================================                                                     (गिरया= रोना, विलाप करना, फरियाद)                                                                                       

Saturday, 12 December 2015

“A pair of shoes” (अ पेअर ऑफ शूज)




एक छोटी, प्यारी सी लड़की जो अपनी कुर्सी पर बैठी बहुत देर से सामने रसोईघर में कुछ बनाती अपनी माँ को देख रही थी......

     थोड़ी देर चुपचाप देखने के बाद वह बोली, “माँ, कल क्रिसमस है ना !”

     “हाँ ! मेरी प्यारी, दुलारी”, उसकी माँ उसकी तरफ बिना देखे बोलीं I

छोटी लड़की कुर्सी से उठकर रसोईघर के दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है, कुछ झिझकती, सकुचाती फिर सहसा बोल पड़ी, “माँ, मुझे भी नये जूते दिला दो, मेरे सारे दोस्तों ने नये जूते खरीदें हैं I”

 “देखो ना प्यारी, मैंने तुम्हारे लिए कितना बढ़िया केक बनाया है!”, माँ ने शायद उसकी बात को बदलना चाहा I
दुःख और क्षोभ आँसू बन लड़की की आँखों में तैर उठे, वह झुंझलाकर लगभग चीख सी पड़ी, “ तुम अच्छी माँ नहीं हो, आज तुमने मेरी बात फिर नहीं सुनी, तुमने बाज़ार से कोई गिफ्ट लेकर नहीं दिया I”

“ओह ! मेरी बच्ची, मैंने नयी फ्रॉक बनायी है ” , माँ उसके हाथों को थाम कर बोलीं I

“बस हर बार वही, सिलाई में बचे कपड़ों को जोड़कर फ्रॉक बना देती हो, मुझे चिढ़ है उससे ”, कहती हुई वह दुखी लड़की, माँ से हाथ छुड़ाकर बाहर की तरफ भागी ..............

             रंग-बिरंगे फूलों और चमकीले झूमरों से सजा बाजार, तरह-तरह के उपहारों, रंगीन मोमबत्तियों और खिलौनों से भरी दुकानें I केक, पेस्ट्री, बिस्किट और नथुनों को फुलाते मीठे पकवानों की खुशबू !

           बाजार की उसी गली में दो दुकानों के बीच दीवार से लगी हुई एक बूढ़े मोची की दुकान I दुकान क्या ..... टाट और लकड़ी के फट्टों से बना एक खोमचा, जो उसका घर भी था......वह जो अकेला था I जब लोग अपनी दुकानों के दरवाजे बंद करते तो वो भी अपना पर्दा गिरा लेता और जब सबकी दुकानें खुलतीं तो उसका पर्दा भी भी उठ जाता I  

          वह बूढ़ा मोची बाजार की रौनक देख सोचता है कि ‘हाथ का हुनर नहीं देखा जाता, देखे जातें हैं मुलायम गलीचे और काँच के कीमती दरवाजे’, उसने अपने पैसों को टटोला, जो थे बस उसके दो वक़्त के नाश्ते की कीमत...एक टोस्ट और एक कप चाय !

           शहर के रईस का घोड़ा बूढ़े मोची की दुकान के आगे रुकता है I वह उससे अपने इकलौते बेटे के लिए जूतों की एक जोड़ी बनाने को कहता है, ठीक वैसा ही या उससे बहतरीन, जैसा उसने एक बार किसी दूसरे रईस के बेटे के लिए बनाया था I बदले में वह एक अच्छी कीमत अदा करेगा I बूढ़ा मोची अपनी सहमती जताता है I

            वह खुश है कि वह इसे कर सकेगा I वह जुट जाता है उस बढ़िया और कीमती चमड़े के टुकड़े को ढूँढने में जिसे उसने बहुत समय से सम्भाल कर रखा था I एक अच्छी कीमत ! उसके इस क्रिसमस का उपहार है जो प्रभु ने उसे दिया है I वह बुनता है कुछ सपने, कुछ खुशियाँ ...........

             इस बार उसे अपनी पत्नी और बच्ची के कब्र पर जंगली फूल नहीं चढानें पड़ेंगे, उनकी पसंदीदा ताजे लाल गुलाब भेंट करेगा साथ में जलाएगा रंगीन मोमबत्तियाँ जिसकी रोशनी में उसकी बच्ची का हँसता चेहरा और भी खिल उठेगा I हाँ, इस बार क्रिसमस पर वह लजीज डिनर के साथ एक पैग बढ़िया ड्रिंक का मजा जरूर लेगा ! वह मन ही मन झूम उठा, उसने उस कीमती चमड़े को चूम लिया I ‘उसे अपने शाम का नाश्ता आज जल्दी ही ले लेना होगा’, उसने सोचा I

             कंधों तक झूलते घुँघराले और सुनहरे बालों वाली वह नन्ही सी लड़की माँ से हाथ छुड़ाकर उस बूढ़े के पास आ गई, जो अक्सर आया करती है I वह उदास लड़की बाजार के भीड़ को देखती है जिसमें बच्चे अपने माता-पिता के साथ अपने मन पसंद के उपहारों को खरीद खुशी-खुशी चले जा रहे हैं I तरसती नज़रों से निहारती है सामने की दुकान में रखे चमचमाते जूतों को, फिर झुकती नज़र रुक जाती है अपने फटे-पुराने जूतों पर I उसके पिता भी होते तो ......... सोचकर उसकी भरी आँखों से आँसुओं की दो नन्ही बूँदे लुढ़क कर उसके कोमल, गुलाबी गालों पर मोतियों जैसे चमकने लगीं I

             वह बूढ़ा उसके दुःख को जानकर दुखी होता है, उसे प्यार से देखकर मुस्कुराता है, उसे समझाता है कि, ‘प्रभु अपने नन्हें फरिश्तों को जो तारों की तरह चमकते हैं, उन्हें कभी निराश नहीं करता I क्रिसमस की रात जब वह सो जायेगी तब वह चुपचाप आयेगा और उसकी पसंद का उपहार रख जायेगा’, यह सुनते हुए लड़की के चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे उसने किसी ऐसे रहस्य को जान लिया, जो केवल उसके लिए था I अभी भी आँसुओं के निशान लिए हुए बुझा सा उसका मासूम चेहरा दमक उठा, लेकिन फिर अगले ही पल बुझ सा गया.........

            ‘उसे मेरे घर का पता कैसे चलेगा ?’,  बड़ी मासूमियत से उसने पुछा I

            ‘उसे सब पता होता है नन्हीं परी !’, बूढ़ा हँस पड़ा I

           वह चहक  उठी, घर की ओर बढ़ी, फिर ठिठक कर मुड़ी, ‘अगर मैं उसे याद नहीं रही तो...?’

           ‘नहीं प्यारी, फिर तुम्हारे पिता भी तो हैं उसके साथ’, बूढ़े ने उसे विश्वास दिलाया I वह खुशी से झूमती हुई घर की तरफ दौड़ी .................

            आज उसकी दुकान का पर्दा बहुत पहले ही गिर चुका था, पूरी रात उसे काम जो करना था, एक बड़ा काम .......

           एक पवित्र सुबह ........, बूढ़े मोची ने बिना किसी भय के शांत भाव से इंकार कर रईस के आगे सर झुका लिया I कपड़े जो पहले ही चिथड़े थे, तार-तार हो गए, कोड़ों की मार को सह न सके I लहुलूहान वह वहीं गिर पड़ा I कुछ दयालुओं ने उसे उठाकर उसकी दुकान में रख दिया I पूरे दिन परदे के पीछे से रह-रह कर आती कुछ बड़बड़ाती, बुदबुदाती, कराहती बुझती सी आवाजें I

              रात का आधा पहर, चारों तरफ पसरा सन्नाटा I सारा शहर खुशियाँ मनाकर सो रहा था बेखबर......., कि अचानक परदे के पीछे भक्क...... ! फैल जाती है एक अद्भुत दुधिया रोशनी और आसमान से गिरते बर्फ के नर्म फुए धरती को ढकने लगे सफेद सर्द चादरों में I

              सपनों से बोझिल अलसाई दो आँखें जैसे ही खुली आश्चर्य से फट पड़ीं ! एक झटके से उछल पड़ी वह नन्हीं प्यारी सी लड़की I प्यार से माँ के गले में बाहें डाल झूल गई I वह उसे दिखाती है अपना सबसे प्यारा बेशकीमती उपहार जिसकी इच्छा उसे बहुत दिनों से थी... खूबसूरत चमचमाते जूतों की एक जोड़ी !

     अगली सुबह बहुत देर तक पर्दा न खुलने पर लोगों ने जब पर्दा उठाकर देखा, वहाँ बूढ़ा नहीं था, थे तो उसके पुराने चिथड़े और ढेरों उपहार साथ में कागज का एक टुकड़ा जिस पर लिखा था, ‘नन्हें फरिश्तों के लिए’ I

             एक साथ बनी दो कब्रें जिन पर रखे थे ढेर सारे ताजे लाल गुलाब और जलती हुई रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ !




Monday, 7 September 2015

‘नव-प्रभात’

नव-प्रभात की नव बेला में,
होता तिमिर का पूर्ण विनाश,
आध्यात्म पुंज का क्षण-प्रतिक्षण,
होता विकास !
प्रकृति सुन्दरी रति सा करती,
अनुपम, अद्वितीय श्रृंगार !
सूर्य आक्रमणकारी करके स्वरूप धारण,
प्रचण्ड, प्रखर रश्मि रथ पर,
होकर आरूढ़ चला अंधकार का,
करने समूल नाश !
गर्भ से निकसित शिशु की भांति,
दिवस करता स्वतन्त्रता का आभास !
खग कोलाहल में रणविजयी सा,
है हर्षोल्लास !
चर-अचर, जन करते प्रारम्भ अपनी कर्म यात्रा,

भरे हृदय में आत्मविश्वास !   

Friday, 14 August 2015

“वह आम आदमी....”

घूमता-फिरता, भागता-दौड़ता,
यहाँ-वहाँ हर रोज,
गलियों में, सड़कों पर,
रिक्शा चलाता, रेढियाँ खींचता,
सब्जियाँ बेचता, दाम तुड़ाता,
कूड़ा बीनता, कचरा उठाता,
देखने में आम, पर सोचो तो,
कितना खास है -
 वह आम आदमी I

एड़ियाँ रगड़ता, घिसटता हुआ,
वक्त की दौड़ से बाहर,
दूर-दूर तक कहीं ............,
ढीटता से बढ़ता रहता, फिर भी
जिंदगी के कितना पास है -
वह आम आदमी I

मेहनत करता, पसीना बहाता,
हड्डियाँ तोड़ता, परिवार पालता,
दुःख झेलता, दर्द सहता, सपने देखता,
रोज कमाता, रोज खाता,
माथे पर बल,पर हँसता रहता,
कितना जाबाँज है -
वह आम आदमी I

चलता रहता, चलता रहता,
रात से आँखे मूँदता,
दिन से खोलता हुआ,
थकान पोंछता, दम भरता,
धूल के गर्द खींच कर साँस लेता,
भीड़ में खोता, लेकिन हर चेहरे में,
पहचान बनाता,
कितना आज है –

वह आम आदमी .....I 

Thursday, 30 July 2015

प्रगति चिन्ह !

मुझे दो वह चिन्ह,
जो बने मेरा मार्गदर्शक –
ऊँचाई हिमालय की, गहराई समुद्र की,
चमकती सफेदी हिमखण्ड सी,
अडिग, अमर, अखण्डित,
सूर्य सारथी अरुण,
ओजस्वी, तेजस्वी, तम नाशक,
ईश्वर वाहक !
महानता अशोक चक्र की,
प्रगतिशीलता काल चक्र की,
अजन्ता सी समलंकृत आकृति,
उत्साह प्रवाहित प्रकृति,
पाखण्ड, आडम्बर हो खण्ड-खण्ड,
पग बाधा का हो शत्रु निरन्तर,
चट्टानी कठोरता, हो वारि तरलता,
पथगामी हो सत्य अनुगामी,
प्रभावहीन जिस पर ऋतु अन्तर,
प्रतिदिन प्रयत्न, दृढ़ निश्चय,
सिद्धान्त सरल –
लक्ष्य भेदना, लक्ष हो विस्मय !
धैर्य, साहस, पराक्रम हो प्रताप की,
गति वेग चेतक सी,
मुझे दो वह –
प्रगति चिन्ह !

Thursday, 23 July 2015

गुमगश्ता (खोया हुआ, भटकता हुआ)

 ये अर्जमन्द मुल्क जितना मेरा है, उतना ही तेरा है ,
 फिर क्यूँ हममें बाकी ‘कीना’ है ?

गुमगश्ता है आजकल खुद ही से,
पूछता है पता किसी और का ?

हर शख्स अदम और आशुफ़्ता है,
इस आज़ाद हिन्दुस्तान में .........

रूह घुट रही है क़फ़स में तेरे,
ऐ खुदा, कि अब हमें अत्फ़ बख्श !

यहाँ अव्यवस्था की व्यवस्था है,
मगर सब दुरुस्त है !



(अर्जमन्द =महान /, कीना = द्वेष, वैर)

(गुमगश्ता = खोया हुआ, भटकता हुआ)

अदम = अस्तित्व हीन, शून्य)

(आशुफ़्ता = घबराया हुआ, बौखलाया हुआ, भ्रमित)

( क़फ़स = शरीर, पिंजरा )

(अत्फ़ = दया, कृपा, प्रेम)