नव-प्रभात
की नव बेला में,
होता
तिमिर का पूर्ण विनाश,
आध्यात्म
पुंज का क्षण-प्रतिक्षण,
होता
विकास !
प्रकृति
सुन्दरी रति सा करती,
अनुपम,
अद्वितीय श्रृंगार !
सूर्य
आक्रमणकारी करके स्वरूप धारण,
प्रचण्ड,
प्रखर रश्मि रथ पर,
होकर
आरूढ़ चला अंधकार का,
करने
समूल नाश !
गर्भ से
निकसित शिशु की भांति,
दिवस
करता स्वतन्त्रता का आभास !
खग
कोलाहल में रणविजयी सा,
है
हर्षोल्लास !
चर-अचर,
जन करते प्रारम्भ अपनी कर्म यात्रा,
भरे हृदय
में आत्मविश्वास !
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