Saturday, 12 December 2015

“A pair of shoes” (अ पेअर ऑफ शूज)




एक छोटी, प्यारी सी लड़की जो अपनी कुर्सी पर बैठी बहुत देर से सामने रसोईघर में कुछ बनाती अपनी माँ को देख रही थी......

     थोड़ी देर चुपचाप देखने के बाद वह बोली, “माँ, कल क्रिसमस है ना !”

     “हाँ ! मेरी प्यारी, दुलारी”, उसकी माँ उसकी तरफ बिना देखे बोलीं I

छोटी लड़की कुर्सी से उठकर रसोईघर के दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है, कुछ झिझकती, सकुचाती फिर सहसा बोल पड़ी, “माँ, मुझे भी नये जूते दिला दो, मेरे सारे दोस्तों ने नये जूते खरीदें हैं I”

 “देखो ना प्यारी, मैंने तुम्हारे लिए कितना बढ़िया केक बनाया है!”, माँ ने शायद उसकी बात को बदलना चाहा I
दुःख और क्षोभ आँसू बन लड़की की आँखों में तैर उठे, वह झुंझलाकर लगभग चीख सी पड़ी, “ तुम अच्छी माँ नहीं हो, आज तुमने मेरी बात फिर नहीं सुनी, तुमने बाज़ार से कोई गिफ्ट लेकर नहीं दिया I”

“ओह ! मेरी बच्ची, मैंने नयी फ्रॉक बनायी है ” , माँ उसके हाथों को थाम कर बोलीं I

“बस हर बार वही, सिलाई में बचे कपड़ों को जोड़कर फ्रॉक बना देती हो, मुझे चिढ़ है उससे ”, कहती हुई वह दुखी लड़की, माँ से हाथ छुड़ाकर बाहर की तरफ भागी ..............

             रंग-बिरंगे फूलों और चमकीले झूमरों से सजा बाजार, तरह-तरह के उपहारों, रंगीन मोमबत्तियों और खिलौनों से भरी दुकानें I केक, पेस्ट्री, बिस्किट और नथुनों को फुलाते मीठे पकवानों की खुशबू !

           बाजार की उसी गली में दो दुकानों के बीच दीवार से लगी हुई एक बूढ़े मोची की दुकान I दुकान क्या ..... टाट और लकड़ी के फट्टों से बना एक खोमचा, जो उसका घर भी था......वह जो अकेला था I जब लोग अपनी दुकानों के दरवाजे बंद करते तो वो भी अपना पर्दा गिरा लेता और जब सबकी दुकानें खुलतीं तो उसका पर्दा भी भी उठ जाता I  

          वह बूढ़ा मोची बाजार की रौनक देख सोचता है कि ‘हाथ का हुनर नहीं देखा जाता, देखे जातें हैं मुलायम गलीचे और काँच के कीमती दरवाजे’, उसने अपने पैसों को टटोला, जो थे बस उसके दो वक़्त के नाश्ते की कीमत...एक टोस्ट और एक कप चाय !

           शहर के रईस का घोड़ा बूढ़े मोची की दुकान के आगे रुकता है I वह उससे अपने इकलौते बेटे के लिए जूतों की एक जोड़ी बनाने को कहता है, ठीक वैसा ही या उससे बहतरीन, जैसा उसने एक बार किसी दूसरे रईस के बेटे के लिए बनाया था I बदले में वह एक अच्छी कीमत अदा करेगा I बूढ़ा मोची अपनी सहमती जताता है I

            वह खुश है कि वह इसे कर सकेगा I वह जुट जाता है उस बढ़िया और कीमती चमड़े के टुकड़े को ढूँढने में जिसे उसने बहुत समय से सम्भाल कर रखा था I एक अच्छी कीमत ! उसके इस क्रिसमस का उपहार है जो प्रभु ने उसे दिया है I वह बुनता है कुछ सपने, कुछ खुशियाँ ...........

             इस बार उसे अपनी पत्नी और बच्ची के कब्र पर जंगली फूल नहीं चढानें पड़ेंगे, उनकी पसंदीदा ताजे लाल गुलाब भेंट करेगा साथ में जलाएगा रंगीन मोमबत्तियाँ जिसकी रोशनी में उसकी बच्ची का हँसता चेहरा और भी खिल उठेगा I हाँ, इस बार क्रिसमस पर वह लजीज डिनर के साथ एक पैग बढ़िया ड्रिंक का मजा जरूर लेगा ! वह मन ही मन झूम उठा, उसने उस कीमती चमड़े को चूम लिया I ‘उसे अपने शाम का नाश्ता आज जल्दी ही ले लेना होगा’, उसने सोचा I

             कंधों तक झूलते घुँघराले और सुनहरे बालों वाली वह नन्ही सी लड़की माँ से हाथ छुड़ाकर उस बूढ़े के पास आ गई, जो अक्सर आया करती है I वह उदास लड़की बाजार के भीड़ को देखती है जिसमें बच्चे अपने माता-पिता के साथ अपने मन पसंद के उपहारों को खरीद खुशी-खुशी चले जा रहे हैं I तरसती नज़रों से निहारती है सामने की दुकान में रखे चमचमाते जूतों को, फिर झुकती नज़र रुक जाती है अपने फटे-पुराने जूतों पर I उसके पिता भी होते तो ......... सोचकर उसकी भरी आँखों से आँसुओं की दो नन्ही बूँदे लुढ़क कर उसके कोमल, गुलाबी गालों पर मोतियों जैसे चमकने लगीं I

             वह बूढ़ा उसके दुःख को जानकर दुखी होता है, उसे प्यार से देखकर मुस्कुराता है, उसे समझाता है कि, ‘प्रभु अपने नन्हें फरिश्तों को जो तारों की तरह चमकते हैं, उन्हें कभी निराश नहीं करता I क्रिसमस की रात जब वह सो जायेगी तब वह चुपचाप आयेगा और उसकी पसंद का उपहार रख जायेगा’, यह सुनते हुए लड़की के चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे उसने किसी ऐसे रहस्य को जान लिया, जो केवल उसके लिए था I अभी भी आँसुओं के निशान लिए हुए बुझा सा उसका मासूम चेहरा दमक उठा, लेकिन फिर अगले ही पल बुझ सा गया.........

            ‘उसे मेरे घर का पता कैसे चलेगा ?’,  बड़ी मासूमियत से उसने पुछा I

            ‘उसे सब पता होता है नन्हीं परी !’, बूढ़ा हँस पड़ा I

           वह चहक  उठी, घर की ओर बढ़ी, फिर ठिठक कर मुड़ी, ‘अगर मैं उसे याद नहीं रही तो...?’

           ‘नहीं प्यारी, फिर तुम्हारे पिता भी तो हैं उसके साथ’, बूढ़े ने उसे विश्वास दिलाया I वह खुशी से झूमती हुई घर की तरफ दौड़ी .................

            आज उसकी दुकान का पर्दा बहुत पहले ही गिर चुका था, पूरी रात उसे काम जो करना था, एक बड़ा काम .......

           एक पवित्र सुबह ........, बूढ़े मोची ने बिना किसी भय के शांत भाव से इंकार कर रईस के आगे सर झुका लिया I कपड़े जो पहले ही चिथड़े थे, तार-तार हो गए, कोड़ों की मार को सह न सके I लहुलूहान वह वहीं गिर पड़ा I कुछ दयालुओं ने उसे उठाकर उसकी दुकान में रख दिया I पूरे दिन परदे के पीछे से रह-रह कर आती कुछ बड़बड़ाती, बुदबुदाती, कराहती बुझती सी आवाजें I

              रात का आधा पहर, चारों तरफ पसरा सन्नाटा I सारा शहर खुशियाँ मनाकर सो रहा था बेखबर......., कि अचानक परदे के पीछे भक्क...... ! फैल जाती है एक अद्भुत दुधिया रोशनी और आसमान से गिरते बर्फ के नर्म फुए धरती को ढकने लगे सफेद सर्द चादरों में I

              सपनों से बोझिल अलसाई दो आँखें जैसे ही खुली आश्चर्य से फट पड़ीं ! एक झटके से उछल पड़ी वह नन्हीं प्यारी सी लड़की I प्यार से माँ के गले में बाहें डाल झूल गई I वह उसे दिखाती है अपना सबसे प्यारा बेशकीमती उपहार जिसकी इच्छा उसे बहुत दिनों से थी... खूबसूरत चमचमाते जूतों की एक जोड़ी !

     अगली सुबह बहुत देर तक पर्दा न खुलने पर लोगों ने जब पर्दा उठाकर देखा, वहाँ बूढ़ा नहीं था, थे तो उसके पुराने चिथड़े और ढेरों उपहार साथ में कागज का एक टुकड़ा जिस पर लिखा था, ‘नन्हें फरिश्तों के लिए’ I

             एक साथ बनी दो कब्रें जिन पर रखे थे ढेर सारे ताजे लाल गुलाब और जलती हुई रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ !




Monday, 7 September 2015

‘नव-प्रभात’

नव-प्रभात की नव बेला में,
होता तिमिर का पूर्ण विनाश,
आध्यात्म पुंज का क्षण-प्रतिक्षण,
होता विकास !
प्रकृति सुन्दरी रति सा करती,
अनुपम, अद्वितीय श्रृंगार !
सूर्य आक्रमणकारी करके स्वरूप धारण,
प्रचण्ड, प्रखर रश्मि रथ पर,
होकर आरूढ़ चला अंधकार का,
करने समूल नाश !
गर्भ से निकसित शिशु की भांति,
दिवस करता स्वतन्त्रता का आभास !
खग कोलाहल में रणविजयी सा,
है हर्षोल्लास !
चर-अचर, जन करते प्रारम्भ अपनी कर्म यात्रा,

भरे हृदय में आत्मविश्वास !   

Friday, 14 August 2015

“वह आम आदमी....”

घूमता-फिरता, भागता-दौड़ता,
यहाँ-वहाँ हर रोज,
गलियों में, सड़कों पर,
रिक्शा चलाता, रेढियाँ खींचता,
सब्जियाँ बेचता, दाम तुड़ाता,
कूड़ा बीनता, कचरा उठाता,
देखने में आम, पर सोचो तो,
कितना खास है -
 वह आम आदमी I

एड़ियाँ रगड़ता, घिसटता हुआ,
वक्त की दौड़ से बाहर,
दूर-दूर तक कहीं ............,
ढीटता से बढ़ता रहता, फिर भी
जिंदगी के कितना पास है -
वह आम आदमी I

मेहनत करता, पसीना बहाता,
हड्डियाँ तोड़ता, परिवार पालता,
दुःख झेलता, दर्द सहता, सपने देखता,
रोज कमाता, रोज खाता,
माथे पर बल,पर हँसता रहता,
कितना जाबाँज है -
वह आम आदमी I

चलता रहता, चलता रहता,
रात से आँखे मूँदता,
दिन से खोलता हुआ,
थकान पोंछता, दम भरता,
धूल के गर्द खींच कर साँस लेता,
भीड़ में खोता, लेकिन हर चेहरे में,
पहचान बनाता,
कितना आज है –

वह आम आदमी .....I 

Thursday, 30 July 2015

प्रगति चिन्ह !

मुझे दो वह चिन्ह,
जो बने मेरा मार्गदर्शक –
ऊँचाई हिमालय की, गहराई समुद्र की,
चमकती सफेदी हिमखण्ड सी,
अडिग, अमर, अखण्डित,
सूर्य सारथी अरुण,
ओजस्वी, तेजस्वी, तम नाशक,
ईश्वर वाहक !
महानता अशोक चक्र की,
प्रगतिशीलता काल चक्र की,
अजन्ता सी समलंकृत आकृति,
उत्साह प्रवाहित प्रकृति,
पाखण्ड, आडम्बर हो खण्ड-खण्ड,
पग बाधा का हो शत्रु निरन्तर,
चट्टानी कठोरता, हो वारि तरलता,
पथगामी हो सत्य अनुगामी,
प्रभावहीन जिस पर ऋतु अन्तर,
प्रतिदिन प्रयत्न, दृढ़ निश्चय,
सिद्धान्त सरल –
लक्ष्य भेदना, लक्ष हो विस्मय !
धैर्य, साहस, पराक्रम हो प्रताप की,
गति वेग चेतक सी,
मुझे दो वह –
प्रगति चिन्ह !

Thursday, 23 July 2015

गुमगश्ता (खोया हुआ, भटकता हुआ)

 ये अर्जमन्द मुल्क जितना मेरा है, उतना ही तेरा है ,
 फिर क्यूँ हममें बाकी ‘कीना’ है ?

गुमगश्ता है आजकल खुद ही से,
पूछता है पता किसी और का ?

हर शख्स अदम और आशुफ़्ता है,
इस आज़ाद हिन्दुस्तान में .........

रूह घुट रही है क़फ़स में तेरे,
ऐ खुदा, कि अब हमें अत्फ़ बख्श !

यहाँ अव्यवस्था की व्यवस्था है,
मगर सब दुरुस्त है !



(अर्जमन्द =महान /, कीना = द्वेष, वैर)

(गुमगश्ता = खोया हुआ, भटकता हुआ)

अदम = अस्तित्व हीन, शून्य)

(आशुफ़्ता = घबराया हुआ, बौखलाया हुआ, भ्रमित)

( क़फ़स = शरीर, पिंजरा )

(अत्फ़ = दया, कृपा, प्रेम)

Monday, 6 July 2015

अश्क़ होते बाकी तो.....

1.    दिल जलता है तो जल जाने दे,
            कि बाहर अँधेरा ही अँधेरा है I

2.    यूँ तो चिराग घर-घर में रोशन होते हैं,
पर किसी-किसी के ही दिल के दिए जलते हैं I

3.    नज़रें ढूँढ लेतीं हैं अँधेरों में भी रोशनी,
नज़र भर के देख तो सही !

4.    हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं ऐ जहाँ,
वक़्त खुद ही सुनाएगा हमारी दास्ताँ I

5.    हिम्मत –ए – चिराग  गर रहे रोशन अँधेरों में,
रास्ते खुद ब खुद रूबरू होंगे कारवाँ में  I

6.     राही थका-थका है, मंज़िल भी अभी दूर.....
मुश्किल ही सही, मगर जाना है जरूर I

7.    अश्क़ होते बाकी तो कुछ कतरे बहा लेता अपनी मईय्यत पे,
जो बह गए थे कभी तेरी बेवफ़ाई के साथ I  

8.    दुनिया ने मुझको लूटा अपना कह-कह के,
           दिल मेरा है टूटा अपनों का सह-सह के I

9.    वैसे तो इस दिल पे हर किसी ने चोट की,
           ये तो मेरा दिल है कि हर चोट सह गया I

10. दूर –दूर तक है गीला आसमाँ, जहाँ नज़र जाए ठहर,

            बस वहीं बरस –बरस….

Thursday, 2 July 2015

‘एक सुबह’

बुनते उम्र के धागे से गुंथा – बंधा,
माँ के आँचल से बाहर सर्द में एक सुबह,
जब उस छोटे लेकिन अपने से आँचल में था,
तब पूरी दुनिया वहीँ जैसे सिमट गई I
अब भी ‘मैं’ ही हूँ, फिर क्यूँ वही,
आँखों से निकलकर दूर..........तक फैल गई ?
लौट नहीं सकता, जो वह मेरा था,
बस सपना बनकर खुलना है,

हर दिन, हर एक सुबह !

Monday, 29 June 2015

“ कल्पना बुनो एक सपना चुनो ”


जब कोई न हो तुम्हारे आस-पास,
 पाओ तुम खुद को अकेला,
तब- हरी घास से भरी धरती को बनालो अपना,
बनालो अपना आकाश I
फिर नई राह पर चलते जाओ,
पीछे मुड़ के मत देखो बस आगे और आगे बढ़ते जाओ I
दिन के हर पलों पे करके खुद का अधिकार,
हर दिन, हर पल कुछ नयी, थोड़ी अजीब कल्पना बुनो I
रात को करके अपना हमराज, दिन के पलों में बुने उन नये,
थोड़े अजीब कल्पनाओं से एक सपना चुनो !
बुनने और चुनने से जीवन के रास्ते 
कुछ आसान से बन जायेंगे,
जो बुना है, जो चुना है, फिर एक दिन आँखों से हाथों तक,
स्पर्श की परिधि में एक नये रूप में, एक नये आकार में,
यदि कहें, शब्दों को खोलकर, कुछ वास्तविकता जोड़कर,
तो वही-
वही सब कुछ साकार होगा I
उलझने, टूटने के बीच में भटकना या,
डर के रूकना नहीं, केवल बुनना और चुनना I
सीमा से परे सीमारहित सोच ही तो कल्पना है,
उसके बुनने में क्या उलझना ?
बस सपने चुनते रहो, वे टूटते रहें तुम देखते रहो !
तब तक देखो, जब तक वे टूटते-टूटते थककर,

चूर हो-
    दो खुली पलकों में ना जायें थम !

Friday, 19 June 2015

आईना भी वही, चेहरा भी वही....


1.    आईना भी वही, चेहरा भी वही,
                 पर देख कुछ इस अंदाज़ से कि –
                      खुद को खुद से रश्क हो जाए I
                           बेगाने आज हैं अपने और ज़मानें वाले,
                               ग़म के साये में गुम हुई धुँधली परछाँई ,
                                     बढ़ाके के हाथ हटा दे हर नकाब कि –
                                चेहरा –चेहरा तेरा अक्स हो जाए I


2.    राह के दामन में अधूरे से कुछ कदमों के निशाँ,
      छोड़ जातें हैं कई सफ़र होने तक I
            उस ज़माने को क्या नाम दें ?
                  दिन के उजाले में जो हाथ थामा करतें हैं,
                       दर्द भरी ग़म की अँधेरी तन्हा रातें,
                           साथ छोड़ जाते हैं सहर होने तक I

      3.   ‘टूटकर’ चाहे, फिर, ‘टूटकर’ जुड़ना चाहे,
               ऐ दिल ! बड़ा ढीठ है..............

      4.   ओ रे ! कोरे कागज़  ...........,
            इक कलम, जरा सी स्याही, कुछ लकीरें, थोड़े अल्फ़ाज और... बहुत सी बदमाशियाँ !

      5.   चलो सुबह की ‘धूप’ लायें,

            मुट्ठी भर ही सही ‘उजाला’ तो लायें I 

Tuesday, 16 June 2015

‘कैसे-कैसे छत !’

यह मौसम की गर्मी का असर था या मेरे अंतस की बेचैनी, मैं तेजी से बहार आ गयी I जून का धधकता सूरज आग बरसा रहा था I दूर तक फैले कंक्रीटों के जंगल सरसरी आँखों में चुभ से गए I झट से ऑंखें बंद हों जाती हैं I सोचने लगी कंक्रीटों के इन पत्थरीले जंगलों में शीतल हवा चले तो कैसे ? सिवा धूल भरे इन अंधड़ों के I सहसा उड़ती नज़र अटक जाती है किसी एक छत पर I एक दुबली-पतली, मुरझाई सूखी सी काया और रंग.....जिसने अपनी उम्र को जाने कितनी ही बार ऐसी ही धूप में कोयला किया हो I तपती छत पर नंगे पैर कपड़े सुखा रही थी, शायद पैरों में पड़े घट्ठों को जलन महसूस ही न होती हो I सुना है कि उस छत की मालकिन का वजन कुछ गिर गया है, इसलिए इसे (औरत) रखा गया है I मेरी नज़रें एकटक उसे देखती रहीं I कुछ भाव पकड़ना चाहती थीं, लेकिन उसका चेहरा था एकदम सपाट और खाली या फिर उसके घट्ठों की तरह बिल्कुल सख्त I कपड़े सुखाने के बीच में वह भी देख लेती मुझे I क्या वह सोचती होगी कि वह अकेली नहीं है इस धूप में, साथ देने को है कोई और छत भी I देखती हूँ उसे जाते हुए और अपने पीछे छोड़ गए कितने ही छोटे-बड़े, चौड़े-संकरे, चिकने और खुरदुरे छत I मन में एक कशक सी उठ जाती है, ‘जाने कैसे-कैसे छत !

Saturday, 13 June 2015

मन, दर्पण और.... चाँद

ओ चाँद ! क्यूँ अकेला है?, जब तारे इतने सारे हैं,
तू, क्यूँ इतना उदास है, जब रात तेरे साथ है !
उसने मुझको बुझी-बुझी गहरी नज़रों से देखा –
ऐसा कोई बंधन जो कहने से उसको खींच रहा था,
कसी मुट्ठी में भींच रहा था I
थाली में पानी भरकर, उसको अपने पास बुलाकर,
मैंने उसको छुआ –
मेरे सहानुभूति के स्पर्शित तरंगों को पाकर,
वो अनजाना बंधन टूट गया,
वह मेरे आगे मुक्त, निःश्चल हो बिखर गया,
पानी का छोटा बुलबुला बन उसका ग़म,
आँखों से सारा पिघल गया I
मैं अन्दर ही तड़पा, पल में पाला भ्रम भी टूटा,
सोच के गहरे दर्पण में, जिसको मैंने चेहरा समझा ‘चाँद’ का -
वह तो अपना ‘मन’ ही निकला, जो दर्पण के पीछे,
चुपचाप खड़ा था !
भावों के उथल-पुथल में, वो आज ऐसे उभर गया,

भीड़ में होकर भी, उदास...अकेला रह गया..............

Friday, 5 June 2015

“ज़िन्दगी तेरी जानिब से...”

खाली सा दिल का कोई कोना...........,
ज़िन्दगी तेरी जानिब से कहीं दिल ना भर जाए I
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वो चुप है, उदास है,
जैसे ज़िन्दगी के हर पन्ने पर लिखी कोई अधूरी इबारत,
पूरी होने के इंतज़ार में ख़ामोश है ..................
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ख़्वाबों की मंज़िलें तो हमने तय कर लीं,
बस रास्तों को नापना बाकी है ...............
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बदलते चेहरे देखकर हँसता रहा .....,
आईने में खड़ा वक़्त हैरान है !
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अधूरे, धूमिल चहरे, कुछ अन्जाने –पहचाने,
हर रोज गुजरते हैं आस-पास,
छोड़ते पैरों के निशाँ......, फिर बनते हैं निशानों पर निशान I
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जलती हुई इस आग में सर्द सी जलन,
सुलगती राख में सिहरन की चुभन,
साँसे जल रहीं हैं, धड़कनों में जमी…… बर्फ ही बर्फ है I
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निकलता है, चमकता है, कुछ कहता है, टिमटिमा कर,

ऊँहू ! आँखें मिचकाकर , दूर ............. वो एक तारा I 

Thursday, 4 June 2015

“मैंने जीया है“

सागर की नीली-भीगी, खेलती-मचलती स्वच्छ लहरों की,
चंचल भंगिमाओं के निर्मल, पारदर्शी आँचल के पीछे,
चुलबुली मीनों की अठखेलियाँ, सीपों के गर्भ में बनते,
श्वेत, चमकते मोतियों को मेरी दृष्टि ने देखा,
और ............ मैनें जिया है I
 फूलों की नन्ही –मुन्नी कोमल पंखुड़ियों के बचपन कलियों का,
सुबह की सुनहरी, चमकीली धूप की हल्की किरणों में लिपट,
सिमटना, खिलना, खिलके हँसना, महकना,
हवा के झोंके से बहके सिहरे स्पंदन को मेरे स्पर्श ने छुआ,
और ............ मैनें जिया है I

पेड़ों की डालियों पर उगे हरे नये पत्तों के झुरमुटों में बैठे,
पक्षियों का कोलाहल, ऊपर खुले आकाश में झुण्डों का,
कुछ एक आकृति बना, ओर के छोर को छूने की चाहना में विचरना,
उड़ानों के वेग में पंखों का फड़फड़ाना,
 फड़फड़ाते कड़ी की हर घड़ी को मेरी धड़कनों ने सुना,
और .............. मैनें जिया है I

पूर्व संध्या की भोर मंदिरों में बजते शंखों की स्वर लहरियों के,
सुर से ताल मिलाती घंटियों की टंकारित ध्वनियों पर,
गूँजते श्लोकों के नृत्यरत को मेरी इन्द्रियों ने थिरका,
और ............. मैनें जिया है I

तितलियों के नर्म-मुलायम पंखों पर बूँदें बन बिखरे रंगों को,
कलियों पर मंडराते भँवरों के मदमाते मधुर गूँजन को,
ऐसे ही कण –कण में समाहित, आलिंगनबद्ध सौन्दर्य के अँगों को,
प्रकृति के सुन्दर, मनोरम, मनभावन अनगिनत रूपों को,
मेरी पलकों ने चुना, 
और .............. मैनें जिया है I  

Wednesday, 3 June 2015

कही - अनकही


1. तुम जो आसमाँ की ऊँचाईयाँ हो गए ........                                                                    
     भूल मत जाना मुझ ज़मीं को I

    2. लहरें पत्थरों से टकराकर, लौट तो जातीं हैं,
         लौटना है उनका बढ़ना, दो क़दम और.... पीछे से I

    3. तब कुछ और था, अब कुछ और है,
    तब और अब के बीच अन्तर है, बस और, और, और .............

4. दो क़दम तुम चलो, दो क़दम हम चलें,
     फासला ज़िन्दगी का बस.........चार क़दम ही तो है I

5. ख़ाके खींचे थे ज़िन्दगी के हमने भी कभी.............                                                                                     वक़्त- ए- खाक़ के कुछ निशाँ....अब भी हैं I 

Wednesday, 8 April 2015

“बूढ़ा – बचपन”

बचपन की बस्ती में, ‘मैं’,
उधड़ी, सिली सूती कमीज और
चरखाने की जांघिया पहने,
सपनों के उड़न खटोले पर उड़ता,
कभी कल्पना के सतरंगी,
घोड़े पे सवार, बन सुंदर राजकुमार,
दूर देश को हो लेता था I
नदी किनारे, कठोर लेकिन बिल्कुल अपने,
पथरीले सिंहासन पर बैठे,
पानी में डूबते कंकड़ों के ध्वनित स्पर्श से,
उभरते तरंगों को देखते,
कब दिन ढलता, कब सँझा घिरती थी ?
दिन भर गलियों में घूमते,
कुछ ढूँढते, टटोलते,
खुद को सबमें ऊँचा कर,
सूती कमीज की जगह –
मलमल का कुर्ता और पायजामा पहन,
गली के चबूतरे पर खेलते, इठलाते उन,
अमीर घरों के बच्चों में, जब मैं चाहता था –
घुलना-मिलाना और खेलना,
जाने क्यों देख मुझको ?
वे अकड़ते, बिदकते, हँसकर चिढ़ाते,
मुँह बिचकाते चल देते थे I
मेरी नन्ही, निःश्चल, स्वप्निल आँखें,
पनीली हो धुल-बह जातीं I
फिर वापस मैं –
उसी कमीज और जांघिये में खड़ा,
उनकी ऊँची अटारियों के आगे,
देखकर अपनी टूटी झोपड़िया,
सकुचाता, शर्म से झुक जाता था I
वहीं, नजदीक ही, नीम के पेड़ के नीचे,
बैठा वह बूढ़ा –
मेरी इस हालत पर हँस देता,
मैं खीझता, सोचता आखिर क्यों,
वो मुझपर हँसता है ?
कभी लगता शायद, बुढ़ापा बचपन से जलता है I
मैं पूछता –
मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा, क्या लिया है,
जो तुम, मुझपर हँसते हो,
मेरे बचपन से जलते हो ?
वो हँसता, फिर थोडा रूककर कहता –
तुम व्यर्थ क्यों रोते हो, अपने सपनों को धोते हो ?
तुम जो कुछ चाहते हो, देखते हो,
अपने हाथों की बंद मुट्ठी को खोलो !
वो सबकुछ तुमको, उसमें छुपा मिल जायेगा,
जो कभी था सपना, वो सच बन जायेगा I
मैं सोचता –
ये बूढ़ा क्या कहता है,
अनरगल, बेसिर-पैर की बकता है ?
मैं मुट्ठी खोल देखता, पर उसने जो भी कहा,
वह कुछ भी नहीं मिलता I
ना बड़े मकान, ना मलमल का कपड़ा,
ना ही स्वादिष्ट मिठाइयाँ और पकवान,
कुछ भी तो नहीं !
मेरा कोमल बच्चा मन, जलभुन जाता I
फिर वो –
मेरी उँगली पकड़ साथ ले चल देता,
लहलहाते हरे-भरे खेतों बीच बने,
मेढ़ों पर चलते –चलते,
वही बातें फिर दोहराता,
मैं कभी सुनता, कभी मुट्ठियों को खोल देखता I
पर पता नहीं क्यों ?
उसकी न समझ में आने वाली तिलस्मी बातें ही,
मेरे मन को भातीं थीं I
लेकिन जब आज –
बचपन से जवानी पर आकर,
उन अनरगल, तिलस्मी बातों का,
भेद समझ में आता है,
मुट्ठी खोल देखता हूँ तो, जो बचपन में नहीं,
वो आज नज़र सब आता है I
उस बूढ़े से, मेरा क्या रिश्ता था कि ?
रोज-रोज उससे मिलना,
उसकी अचंभित बातें अच्छी लगती थीं I
ऐसा लगता है –
बचपन और बुढ़ापे के बीच बीते जीवन का,
खट्टा-मीठा अनुभव ही रिश्ता होता है,
एक, कुछ खोता है और एक बहुत कुछ पता है I
मैं बार-बार, हर बार यही एक बात,
सोचता हूँ –
अगर बुढ़ापे का हाथ ना होता तो,
बचपन कैसे पलता, कैसे चलता ?
तब तो –
ना मुट्ठी ना जीवन होता,

ना ही बचपन की बस्ती होती I