मुझे दो
वह चिन्ह,
जो बने
मेरा मार्गदर्शक –
ऊँचाई
हिमालय की, गहराई समुद्र की,
चमकती
सफेदी हिमखण्ड सी,
अडिग,
अमर, अखण्डित,
सूर्य
सारथी अरुण,
ओजस्वी,
तेजस्वी, तम नाशक,
ईश्वर
वाहक !
महानता
अशोक चक्र की,
प्रगतिशीलता
काल चक्र की,
अजन्ता
सी समलंकृत आकृति,
उत्साह
प्रवाहित प्रकृति,
पाखण्ड,
आडम्बर हो खण्ड-खण्ड,
पग बाधा
का हो शत्रु निरन्तर,
चट्टानी
कठोरता, हो वारि तरलता,
पथगामी
हो सत्य अनुगामी,
प्रभावहीन
जिस पर ऋतु अन्तर,
प्रतिदिन
प्रयत्न, दृढ़ निश्चय,
सिद्धान्त
सरल –
लक्ष्य
भेदना, लक्ष हो विस्मय !
धैर्य,
साहस, पराक्रम हो प्रताप की,
गति वेग
चेतक सी,
मुझे दो
वह –
प्रगति
चिन्ह !
No comments:
Post a Comment