Monday, 22 September 2014

नदी और किनारा



नदी मोड़ती है किनारों को,

या किनारे मोड़ते हैं नदी को!

लगता है दोनों ही,एक-दूसरे के सहारे मुड़ते हैं I

देखा नहीं-

नदी का कोई किनारा ना हो,

कभी सुना है –

बिना नदी का किनारा हो !

ये और बात है कि-

बदलती रहती हैं किनारों की सूरतें,

कहीं कच्ची, कहीं पक्की ईंटों से बनी,

ढली, ढलानों सी ढरकी कहीं ,

कहीं भीड़ से भरी-सजी,

अकेली बिरहन सी निहारती कहीं I

नदी और किनारे ........

कई बार किनारे, दबा देते हैं नदी को,

तो कितनी ही बार,

नदी ने धकेला है किनारों को I

नदी और किनारा...

Thursday, 18 September 2014

कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी....




कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी-
बच्चों के खेलकूद, बुजुर्गों के तजुर्बे,
औरतों के कुछ सुख- दुःख,
सुबह –शाम तीनों पहर-
चहल –पहल, जमघट,
गपशप, हँसी ठहाके,
खिड़कियाँ भी झाँकती थीं,
दरवाजे भी खुलते,
रोशनी के लिए रोशनदान भी होते-
कुछ जाने –पहचाने, अपने से चेहरों पर,
ख़ुशी भी झलकती, कुछ दर्द भी उभरते,
हाल-चाल, खैरियत.. सब तबीयत से पूछे जाते,
फुर्सत और तसल्ली से कुछ बातें भी सुनी जातीं,
कभी अनकही भी पढ़ी जाती,
हाँ! ये सच है-
ये गली भी कभी बोलती थी-
कुछ आंसू, कुछ सांसे और बहुत सा इत्मीनान,
सब कुछ तो था......
पर ये गली अब सिकुड़ सी गई है –
तंग, मैली और कुछ बंद–बंद,
दिलों की तरह I
चेहरे हँसते थे, सर्दिओं के कुनकुने धूप से,
आँखों में पानी भी उतरता,
गुनगुना और साफ, शीशे की तरह I    
मगर अब हँसी कुछ चुभती है,
आँखों का पानी भी सूख गया -
गली के बूढ़े नल की तरह I

Wednesday, 17 September 2014

शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,



शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,

वो कहतें हैं अक्सर-

हम दल–बल, शौर्य सेना जिद्द –ए – जिहाद !

बल –दल, बादल बनके बुझाई कभी कोई आग,

जो है किसानी या बढ़ती बेलगाम मनमानी ?

करते हो बस दल बदल I

कहलवाते हो शक्ति सेना-

तो कुचला है कभी,

आतंक के आतंकी फन को या फिर रोका है ,

धमाकों के बढ़ते क़दमों को,

छीन ली गईं  जमीं जो, बढ़ के कसी है मुट्ठी में कभी?

बस लगाते हो चैन-ओ-अमन में आग़ I

छेड़ता है बिना बात, बेमतलब कि जिहाद-

ओ! ख़ुदा के बन्दे सुनी है कभी,

खुद के कौम की फ़रियाद!

बचाया है कभी, किसी हुसैन की कटती- गिरती जान?

जिसे गिराई थी किसी जुनूनी, ज़िद्दी ज़िहादी की जिहाद ने I