नदी मोड़ती है
किनारों को,
या किनारे मोड़ते
हैं नदी को!
लगता है दोनों ही,एक-दूसरे
के सहारे मुड़ते हैं I
देखा नहीं-
नदी का कोई किनारा
ना हो,
कभी सुना है –
बिना नदी का किनारा
हो !
ये और बात है कि-
बदलती रहती हैं
किनारों की सूरतें,
कहीं कच्ची, कहीं
पक्की ईंटों से बनी,
ढली, ढलानों सी
ढरकी कहीं ,
कहीं भीड़ से
भरी-सजी,
अकेली बिरहन सी
निहारती कहीं I
नदी और किनारे
........
कई बार किनारे,
दबा देते हैं नदी को,
तो कितनी ही बार,
नदी ने धकेला है
किनारों को I
नदी और किनारा...