Wednesday, 17 September 2014

शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,



शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,

वो कहतें हैं अक्सर-

हम दल–बल, शौर्य सेना जिद्द –ए – जिहाद !

बल –दल, बादल बनके बुझाई कभी कोई आग,

जो है किसानी या बढ़ती बेलगाम मनमानी ?

करते हो बस दल बदल I

कहलवाते हो शक्ति सेना-

तो कुचला है कभी,

आतंक के आतंकी फन को या फिर रोका है ,

धमाकों के बढ़ते क़दमों को,

छीन ली गईं  जमीं जो, बढ़ के कसी है मुट्ठी में कभी?

बस लगाते हो चैन-ओ-अमन में आग़ I

छेड़ता है बिना बात, बेमतलब कि जिहाद-

ओ! ख़ुदा के बन्दे सुनी है कभी,

खुद के कौम की फ़रियाद!

बचाया है कभी, किसी हुसैन की कटती- गिरती जान?

जिसे गिराई थी किसी जुनूनी, ज़िद्दी ज़िहादी की जिहाद ने I  

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