शक्लें बदलती हैं,
फितरतें भी,
वो कहतें हैं
अक्सर-
हम दल–बल, शौर्य
सेना जिद्द –ए – जिहाद !
बल –दल, बादल बनके
बुझाई कभी कोई आग,
जो है किसानी या
बढ़ती बेलगाम मनमानी ?
करते हो बस दल बदल I
कहलवाते हो शक्ति
सेना-
तो कुचला है कभी,
आतंक के आतंकी फन
को या फिर रोका है ,
धमाकों के बढ़ते
क़दमों को,
छीन ली गईं जमीं जो, बढ़ के कसी है मुट्ठी में कभी?
बस लगाते हो चैन-ओ-अमन
में आग़ I
छेड़ता है बिना
बात, बेमतलब कि जिहाद-
ओ! ख़ुदा के बन्दे
सुनी है कभी,
खुद के कौम की
फ़रियाद!
बचाया है कभी,
किसी हुसैन की कटती- गिरती जान?
जिसे गिराई थी
किसी जुनूनी, ज़िद्दी ज़िहादी की जिहाद ने I
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