Monday, 22 September 2014

नदी और किनारा



नदी मोड़ती है किनारों को,

या किनारे मोड़ते हैं नदी को!

लगता है दोनों ही,एक-दूसरे के सहारे मुड़ते हैं I

देखा नहीं-

नदी का कोई किनारा ना हो,

कभी सुना है –

बिना नदी का किनारा हो !

ये और बात है कि-

बदलती रहती हैं किनारों की सूरतें,

कहीं कच्ची, कहीं पक्की ईंटों से बनी,

ढली, ढलानों सी ढरकी कहीं ,

कहीं भीड़ से भरी-सजी,

अकेली बिरहन सी निहारती कहीं I

नदी और किनारे ........

कई बार किनारे, दबा देते हैं नदी को,

तो कितनी ही बार,

नदी ने धकेला है किनारों को I

नदी और किनारा...

No comments:

Post a Comment