Thursday, 18 September 2014

कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी....




कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी-
बच्चों के खेलकूद, बुजुर्गों के तजुर्बे,
औरतों के कुछ सुख- दुःख,
सुबह –शाम तीनों पहर-
चहल –पहल, जमघट,
गपशप, हँसी ठहाके,
खिड़कियाँ भी झाँकती थीं,
दरवाजे भी खुलते,
रोशनी के लिए रोशनदान भी होते-
कुछ जाने –पहचाने, अपने से चेहरों पर,
ख़ुशी भी झलकती, कुछ दर्द भी उभरते,
हाल-चाल, खैरियत.. सब तबीयत से पूछे जाते,
फुर्सत और तसल्ली से कुछ बातें भी सुनी जातीं,
कभी अनकही भी पढ़ी जाती,
हाँ! ये सच है-
ये गली भी कभी बोलती थी-
कुछ आंसू, कुछ सांसे और बहुत सा इत्मीनान,
सब कुछ तो था......
पर ये गली अब सिकुड़ सी गई है –
तंग, मैली और कुछ बंद–बंद,
दिलों की तरह I
चेहरे हँसते थे, सर्दिओं के कुनकुने धूप से,
आँखों में पानी भी उतरता,
गुनगुना और साफ, शीशे की तरह I    
मगर अब हँसी कुछ चुभती है,
आँखों का पानी भी सूख गया -
गली के बूढ़े नल की तरह I

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