कभी... ये गली भी चौड़ी
हुआ करती थी-
बच्चों के खेलकूद,
बुजुर्गों के तजुर्बे,
औरतों के कुछ सुख-
दुःख,
सुबह –शाम तीनों
पहर-
चहल –पहल, जमघट,
गपशप, हँसी ठहाके,
खिड़कियाँ भी
झाँकती थीं,
दरवाजे भी खुलते,
रोशनी के लिए
रोशनदान भी होते-
कुछ जाने –पहचाने,
अपने से चेहरों पर,
ख़ुशी भी झलकती,
कुछ दर्द भी उभरते,
हाल-चाल, खैरियत..
सब तबीयत से पूछे जाते,
फुर्सत और तसल्ली
से कुछ बातें भी सुनी जातीं,
कभी अनकही भी पढ़ी
जाती,
हाँ! ये सच है-
ये गली भी कभी
बोलती थी-
कुछ आंसू, कुछ
सांसे और बहुत सा इत्मीनान,
सब कुछ तो था......
पर ये गली अब
सिकुड़ सी गई है –
तंग, मैली और कुछ
बंद–बंद,
दिलों की तरह I
चेहरे हँसते थे,
सर्दिओं के कुनकुने धूप से,
आँखों में पानी भी
उतरता,
गुनगुना और साफ,
शीशे की तरह I
मगर अब हँसी कुछ
चुभती है,
आँखों का पानी भी
सूख गया -
गली के बूढ़े नल की
तरह I
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