Wednesday, 26 November 2014

KHOL DE DHAKKAN (खोल दे ढक्कन)

  "गीत"

खोल दे ढक्कन, सब तोड़ के बंधन, मत बन बोतल  
चल बहक-बहक, कुछ बहक अब बहक  
खुद को हिला के, जज्बातों की झाग बना के 
अरे हिम्मत की हथेली पर सागर दे उडेल  
चल बहक-बहक................................ 
कमज़ोर नही, तू किसी हाथों की डोर नही  
अब सुन ले दिल की, कुछ पागलपन की  
मत मान किसी की  
खुद को जगा के, दुनिया को हिला के  
आँधी को दे तू मोड़  
चल बहक ................................... 
तेरी हस्ती है क्या, ये सबको बता  
ओ बेफिकर कर अपनी कदर  
बेपरवाह जवानी, लिख नई कहानी  
उठ जा रे उठ जा  
जोश का इक घूँट लगाके  
होश का फिर नशा चढ़ाके  
दो कदम बढ़ा, कुछ हाथ मिला  
पानी को बहा के, थोड़ा रंग जमा के  
पत्थर का सीना चीर  

चल बहक-बहक, कुछ बहक, अब बहक

Monday, 22 September 2014

नदी और किनारा



नदी मोड़ती है किनारों को,

या किनारे मोड़ते हैं नदी को!

लगता है दोनों ही,एक-दूसरे के सहारे मुड़ते हैं I

देखा नहीं-

नदी का कोई किनारा ना हो,

कभी सुना है –

बिना नदी का किनारा हो !

ये और बात है कि-

बदलती रहती हैं किनारों की सूरतें,

कहीं कच्ची, कहीं पक्की ईंटों से बनी,

ढली, ढलानों सी ढरकी कहीं ,

कहीं भीड़ से भरी-सजी,

अकेली बिरहन सी निहारती कहीं I

नदी और किनारे ........

कई बार किनारे, दबा देते हैं नदी को,

तो कितनी ही बार,

नदी ने धकेला है किनारों को I

नदी और किनारा...

Thursday, 18 September 2014

कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी....




कभी... ये गली भी चौड़ी हुआ करती थी-
बच्चों के खेलकूद, बुजुर्गों के तजुर्बे,
औरतों के कुछ सुख- दुःख,
सुबह –शाम तीनों पहर-
चहल –पहल, जमघट,
गपशप, हँसी ठहाके,
खिड़कियाँ भी झाँकती थीं,
दरवाजे भी खुलते,
रोशनी के लिए रोशनदान भी होते-
कुछ जाने –पहचाने, अपने से चेहरों पर,
ख़ुशी भी झलकती, कुछ दर्द भी उभरते,
हाल-चाल, खैरियत.. सब तबीयत से पूछे जाते,
फुर्सत और तसल्ली से कुछ बातें भी सुनी जातीं,
कभी अनकही भी पढ़ी जाती,
हाँ! ये सच है-
ये गली भी कभी बोलती थी-
कुछ आंसू, कुछ सांसे और बहुत सा इत्मीनान,
सब कुछ तो था......
पर ये गली अब सिकुड़ सी गई है –
तंग, मैली और कुछ बंद–बंद,
दिलों की तरह I
चेहरे हँसते थे, सर्दिओं के कुनकुने धूप से,
आँखों में पानी भी उतरता,
गुनगुना और साफ, शीशे की तरह I    
मगर अब हँसी कुछ चुभती है,
आँखों का पानी भी सूख गया -
गली के बूढ़े नल की तरह I

Wednesday, 17 September 2014

शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,



शक्लें बदलती हैं, फितरतें भी,

वो कहतें हैं अक्सर-

हम दल–बल, शौर्य सेना जिद्द –ए – जिहाद !

बल –दल, बादल बनके बुझाई कभी कोई आग,

जो है किसानी या बढ़ती बेलगाम मनमानी ?

करते हो बस दल बदल I

कहलवाते हो शक्ति सेना-

तो कुचला है कभी,

आतंक के आतंकी फन को या फिर रोका है ,

धमाकों के बढ़ते क़दमों को,

छीन ली गईं  जमीं जो, बढ़ के कसी है मुट्ठी में कभी?

बस लगाते हो चैन-ओ-अमन में आग़ I

छेड़ता है बिना बात, बेमतलब कि जिहाद-

ओ! ख़ुदा के बन्दे सुनी है कभी,

खुद के कौम की फ़रियाद!

बचाया है कभी, किसी हुसैन की कटती- गिरती जान?

जिसे गिराई थी किसी जुनूनी, ज़िद्दी ज़िहादी की जिहाद ने I