बचपन की बस्ती में, ‘मैं’,
उधड़ी, सिली सूती कमीज और
चरखाने की जांघिया पहने,
सपनों के उड़न खटोले पर उड़ता,
कभी कल्पना के सतरंगी,
घोड़े पे सवार, बन सुंदर राजकुमार,
दूर देश को हो लेता था I
नदी किनारे, कठोर लेकिन बिल्कुल अपने,
पथरीले सिंहासन पर बैठे,
पानी में डूबते कंकड़ों के ध्वनित स्पर्श से,
उभरते तरंगों को देखते,
कब दिन ढलता, कब सँझा घिरती थी ?
दिन भर गलियों में घूमते,
कुछ ढूँढते, टटोलते,
खुद को सबमें ऊँचा कर,
सूती कमीज की जगह –
मलमल का कुर्ता और पायजामा पहन,
गली के चबूतरे पर खेलते, इठलाते उन,
अमीर घरों के बच्चों में, जब मैं चाहता था –
घुलना-मिलाना और खेलना,
जाने क्यों देख मुझको ?
वे अकड़ते, बिदकते, हँसकर चिढ़ाते,
मुँह बिचकाते चल देते थे I
मेरी नन्ही, निःश्चल, स्वप्निल आँखें,
पनीली हो धुल-बह जातीं I
फिर वापस मैं –
उसी कमीज और जांघिये में खड़ा,
उनकी ऊँची अटारियों के आगे,
देखकर अपनी टूटी झोपड़िया,
सकुचाता, शर्म से झुक जाता था I
वहीं, नजदीक ही, नीम के पेड़ के नीचे,
बैठा वह बूढ़ा –
मेरी इस हालत पर हँस देता,
मैं खीझता, सोचता आखिर क्यों,
वो मुझपर हँसता है ?
कभी लगता शायद, बुढ़ापा बचपन से जलता है I
मैं पूछता –
मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा, क्या लिया है,
जो तुम, मुझपर हँसते हो,
मेरे बचपन से जलते हो ?
वो हँसता, फिर थोडा रूककर कहता –
तुम व्यर्थ क्यों रोते हो, अपने सपनों को धोते हो ?
तुम जो कुछ चाहते हो, देखते हो,
अपने हाथों की बंद मुट्ठी को खोलो !
वो सबकुछ तुमको, उसमें छुपा मिल जायेगा,
जो कभी था सपना, वो सच बन जायेगा I
मैं सोचता –
ये बूढ़ा क्या कहता है,
अनरगल, बेसिर-पैर की बकता है ?
मैं मुट्ठी खोल देखता, पर उसने जो भी कहा,
वह कुछ भी नहीं मिलता I
ना बड़े मकान, ना मलमल का कपड़ा,
ना ही स्वादिष्ट मिठाइयाँ और पकवान,
कुछ भी तो नहीं !
मेरा कोमल बच्चा मन, जलभुन जाता I
फिर वो –
मेरी उँगली पकड़ साथ ले चल देता,
लहलहाते हरे-भरे खेतों बीच बने,
मेढ़ों पर चलते –चलते,
वही बातें फिर दोहराता,
मैं कभी सुनता, कभी मुट्ठियों को खोल देखता I
पर पता नहीं क्यों ?
उसकी न समझ में आने वाली तिलस्मी बातें ही,
मेरे मन को भातीं थीं I
लेकिन जब आज –
बचपन से जवानी पर आकर,
उन अनरगल, तिलस्मी बातों का,
भेद समझ में आता है,
मुट्ठी खोल देखता हूँ तो, जो बचपन में नहीं,
वो आज नज़र सब आता है I
उस बूढ़े से, मेरा क्या रिश्ता था कि ?
रोज-रोज उससे मिलना,
उसकी अचंभित बातें अच्छी लगती थीं I
ऐसा लगता है –
बचपन और बुढ़ापे के बीच बीते जीवन का,
खट्टा-मीठा अनुभव ही रिश्ता होता है,
एक, कुछ खोता है और एक बहुत कुछ पता है I
मैं बार-बार, हर बार यही एक बात,
सोचता हूँ –
अगर बुढ़ापे का हाथ ना होता तो,
बचपन कैसे पलता, कैसे चलता ?
तब तो –
ना मुट्ठी ना जीवन होता,
ना ही बचपन की बस्ती होती I