Monday, 7 September 2015

‘नव-प्रभात’

नव-प्रभात की नव बेला में,
होता तिमिर का पूर्ण विनाश,
आध्यात्म पुंज का क्षण-प्रतिक्षण,
होता विकास !
प्रकृति सुन्दरी रति सा करती,
अनुपम, अद्वितीय श्रृंगार !
सूर्य आक्रमणकारी करके स्वरूप धारण,
प्रचण्ड, प्रखर रश्मि रथ पर,
होकर आरूढ़ चला अंधकार का,
करने समूल नाश !
गर्भ से निकसित शिशु की भांति,
दिवस करता स्वतन्त्रता का आभास !
खग कोलाहल में रणविजयी सा,
है हर्षोल्लास !
चर-अचर, जन करते प्रारम्भ अपनी कर्म यात्रा,

भरे हृदय में आत्मविश्वास !