1.
आईना
भी वही, चेहरा भी वही,
पर देख कुछ इस अंदाज़ से कि –
खुद को खुद से रश्क हो जाए I
बेगाने आज हैं अपने और ज़मानें वाले,
ग़म के साये में गुम हुई धुँधली परछाँई ,
बढ़ाके के हाथ हटा दे हर नकाब कि –
चेहरा –चेहरा
तेरा अक्स हो जाए I
2.
राह के दामन में अधूरे से कुछ कदमों के
निशाँ,
छोड़ जातें हैं
कई सफ़र होने तक I
उस
ज़माने को क्या नाम दें ?
दिन
के उजाले में जो हाथ थामा करतें हैं,
दर्द भरी ग़म की अँधेरी तन्हा रातें,
साथ छोड़ जाते हैं सहर होने तक I
3. ‘टूटकर’ चाहे, फिर, ‘टूटकर’ जुड़ना चाहे,
ऐ दिल ! बड़ा ढीठ है..............
4. ओ रे ! कोरे कागज़ ...........,
इक कलम, जरा सी स्याही, कुछ लकीरें,
थोड़े अल्फ़ाज और... बहुत सी बदमाशियाँ !
5.
चलो सुबह की ‘धूप’ लायें,
मुट्ठी भर ही सही ‘उजाला’ तो लायें I
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