यह मौसम की गर्मी का असर था या मेरे
अंतस की बेचैनी, मैं तेजी
से बहार आ गयी I जून का धधकता
सूरज आग बरसा रहा था I दूर तक फैले
कंक्रीटों के जंगल सरसरी आँखों में चुभ से गए I झट से ऑंखें बंद हों जाती हैं I सोचने लगी कंक्रीटों
के इन पत्थरीले जंगलों में शीतल हवा चले तो कैसे ? सिवा धूल भरे इन अंधड़ों के I सहसा उड़ती नज़र अटक
जाती है किसी एक छत पर I एक दुबली-पतली, मुरझाई सूखी सी काया
और रंग.....जिसने अपनी उम्र को जाने कितनी ही बार ऐसी ही धूप में कोयला किया हो I तपती छत पर नंगे पैर
कपड़े सुखा रही थी, शायद पैरों
में पड़े घट्ठों को जलन महसूस ही न होती हो I सुना है कि उस छत की मालकिन का वजन कुछ गिर गया है, इसलिए इसे (औरत) रखा
गया है I मेरी नज़रें
एकटक उसे देखती रहीं I कुछ भाव पकड़ना
चाहती थीं, लेकिन उसका
चेहरा था एकदम सपाट और खाली या फिर उसके घट्ठों की तरह बिल्कुल सख्त I कपड़े सुखाने के बीच
में वह भी देख लेती मुझे I
क्या वह सोचती होगी कि वह अकेली नहीं है इस धूप में, साथ देने को है कोई
और छत भी I देखती हूँ
उसे जाते हुए और अपने पीछे छोड़ गए कितने ही छोटे-बड़े, चौड़े-संकरे, चिकने और खुरदुरे
छत I मन में एक
कशक सी उठ जाती है, ‘जाने कैसे-कैसे
छत !’
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