Tuesday, 16 June 2015

‘कैसे-कैसे छत !’

यह मौसम की गर्मी का असर था या मेरे अंतस की बेचैनी, मैं तेजी से बहार आ गयी I जून का धधकता सूरज आग बरसा रहा था I दूर तक फैले कंक्रीटों के जंगल सरसरी आँखों में चुभ से गए I झट से ऑंखें बंद हों जाती हैं I सोचने लगी कंक्रीटों के इन पत्थरीले जंगलों में शीतल हवा चले तो कैसे ? सिवा धूल भरे इन अंधड़ों के I सहसा उड़ती नज़र अटक जाती है किसी एक छत पर I एक दुबली-पतली, मुरझाई सूखी सी काया और रंग.....जिसने अपनी उम्र को जाने कितनी ही बार ऐसी ही धूप में कोयला किया हो I तपती छत पर नंगे पैर कपड़े सुखा रही थी, शायद पैरों में पड़े घट्ठों को जलन महसूस ही न होती हो I सुना है कि उस छत की मालकिन का वजन कुछ गिर गया है, इसलिए इसे (औरत) रखा गया है I मेरी नज़रें एकटक उसे देखती रहीं I कुछ भाव पकड़ना चाहती थीं, लेकिन उसका चेहरा था एकदम सपाट और खाली या फिर उसके घट्ठों की तरह बिल्कुल सख्त I कपड़े सुखाने के बीच में वह भी देख लेती मुझे I क्या वह सोचती होगी कि वह अकेली नहीं है इस धूप में, साथ देने को है कोई और छत भी I देखती हूँ उसे जाते हुए और अपने पीछे छोड़ गए कितने ही छोटे-बड़े, चौड़े-संकरे, चिकने और खुरदुरे छत I मन में एक कशक सी उठ जाती है, ‘जाने कैसे-कैसे छत !

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