Monday, 29 June 2015

“ कल्पना बुनो एक सपना चुनो ”


जब कोई न हो तुम्हारे आस-पास,
 पाओ तुम खुद को अकेला,
तब- हरी घास से भरी धरती को बनालो अपना,
बनालो अपना आकाश I
फिर नई राह पर चलते जाओ,
पीछे मुड़ के मत देखो बस आगे और आगे बढ़ते जाओ I
दिन के हर पलों पे करके खुद का अधिकार,
हर दिन, हर पल कुछ नयी, थोड़ी अजीब कल्पना बुनो I
रात को करके अपना हमराज, दिन के पलों में बुने उन नये,
थोड़े अजीब कल्पनाओं से एक सपना चुनो !
बुनने और चुनने से जीवन के रास्ते 
कुछ आसान से बन जायेंगे,
जो बुना है, जो चुना है, फिर एक दिन आँखों से हाथों तक,
स्पर्श की परिधि में एक नये रूप में, एक नये आकार में,
यदि कहें, शब्दों को खोलकर, कुछ वास्तविकता जोड़कर,
तो वही-
वही सब कुछ साकार होगा I
उलझने, टूटने के बीच में भटकना या,
डर के रूकना नहीं, केवल बुनना और चुनना I
सीमा से परे सीमारहित सोच ही तो कल्पना है,
उसके बुनने में क्या उलझना ?
बस सपने चुनते रहो, वे टूटते रहें तुम देखते रहो !
तब तक देखो, जब तक वे टूटते-टूटते थककर,

चूर हो-
    दो खुली पलकों में ना जायें थम !

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