Saturday, 13 June 2015

मन, दर्पण और.... चाँद

ओ चाँद ! क्यूँ अकेला है?, जब तारे इतने सारे हैं,
तू, क्यूँ इतना उदास है, जब रात तेरे साथ है !
उसने मुझको बुझी-बुझी गहरी नज़रों से देखा –
ऐसा कोई बंधन जो कहने से उसको खींच रहा था,
कसी मुट्ठी में भींच रहा था I
थाली में पानी भरकर, उसको अपने पास बुलाकर,
मैंने उसको छुआ –
मेरे सहानुभूति के स्पर्शित तरंगों को पाकर,
वो अनजाना बंधन टूट गया,
वह मेरे आगे मुक्त, निःश्चल हो बिखर गया,
पानी का छोटा बुलबुला बन उसका ग़म,
आँखों से सारा पिघल गया I
मैं अन्दर ही तड़पा, पल में पाला भ्रम भी टूटा,
सोच के गहरे दर्पण में, जिसको मैंने चेहरा समझा ‘चाँद’ का -
वह तो अपना ‘मन’ ही निकला, जो दर्पण के पीछे,
चुपचाप खड़ा था !
भावों के उथल-पुथल में, वो आज ऐसे उभर गया,

भीड़ में होकर भी, उदास...अकेला रह गया..............

No comments:

Post a Comment