सागर की नीली-भीगी, खेलती-मचलती स्वच्छ लहरों की,
चंचल भंगिमाओं के निर्मल, पारदर्शी आँचल के पीछे,
चुलबुली मीनों की अठखेलियाँ, सीपों के गर्भ में बनते,
श्वेत, चमकते मोतियों को मेरी दृष्टि ने देखा,
और ............ मैनें जिया है I
सुबह की सुनहरी, चमकीली धूप की हल्की किरणों में लिपट,
सिमटना, खिलना, खिलके हँसना, महकना,
हवा के झोंके से बहके सिहरे स्पंदन को मेरे स्पर्श ने छुआ,
और ............ मैनें जिया है I
पेड़ों की डालियों पर उगे हरे नये पत्तों के झुरमुटों में बैठे,
पक्षियों का कोलाहल, ऊपर खुले आकाश में झुण्डों का,
कुछ एक आकृति बना, ओर के छोर को छूने की चाहना में विचरना,
उड़ानों के वेग में पंखों का फड़फड़ाना,
फड़फड़ाते कड़ी की हर घड़ी को मेरी धड़कनों
ने सुना,
और .............. मैनें जिया है I
पूर्व संध्या की भोर मंदिरों में बजते शंखों की स्वर लहरियों के,
सुर से ताल मिलाती घंटियों की टंकारित ध्वनियों पर,
गूँजते श्लोकों के नृत्यरत को मेरी इन्द्रियों ने थिरका,
और ............. मैनें जिया है I
तितलियों के नर्म-मुलायम पंखों पर बूँदें बन बिखरे रंगों को,
कलियों पर मंडराते भँवरों के मदमाते मधुर गूँजन को,
ऐसे ही कण –कण में समाहित, आलिंगनबद्ध सौन्दर्य के
अँगों को,
प्रकृति के सुन्दर, मनोरम, मनभावन अनगिनत रूपों को,
मेरी पलकों ने चुना,
और .............. मैनें जिया है I
तितलियों के नर्म-मुलायम पंखों पर बूँदें बन बिखरे रंगों को,.........................................वाह क्या उपमा दी है!! पूजा उपाध्याय के ब्लॉग पर उनसे अपना ब्लॉग देखने की आपका अनुरोध देखा, तो सोचा आपके ब्लॉग को देखूं। सच में आपकी यह कविता प्रकृति के कण-कण को जिस सुंदरता से उकेरती है और जिस प्रकार आपकी अभिरुचियों का मिलान प्राकृतिक उपमाओं से होता है, वह समझने योग्य है। बहुत सुंदर। लिखते रहिए। शुभकामनाओं सहित।
ReplyDeleteविकेश जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! आप सबकी सराहना ही मेरी प्रेरणा है I
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